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एक नई पहचान

कबीर सिंह बनाम अर्जुन रेड्डी (Kavir Singh vs Arjun Reddy)

Kavir Singh vs Arjun Reddy

हाल ही में शाहिद कपूर की बहुप्रतीक्षित फ़िल्म कबीर सिंह का ट्रेलर रिलीज़ हुआ है. इस फ़िल्म को शाहिद की ‘करो या मरो’ वाली फ़िल्म कहा जा रहा है क्योंकि इसके पहले की उनकी कुछ फिल्में बॉक्स ऑफिस पर कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा पाई थीं. कबीर सिंह का ट्रेलर उम्मीदें जगाने वाला है. आशा है कि जो सूखा बॉक्स ऑफिस पर शाहिद को मिल रहा था वह इस फ़िल्म से हरियाली में बदल जाएगा.

अब आगे जो तथ्य मैं पेश करने जा रहा हूँ वो उन लोगों के लिए है जो उसे नहीं जानते. कबीर सिंह 2017 में आई तेलुगु ब्लॉकबस्टर अर्जुन रेड्डी का रीमेक है. तीन घंटे छः मिनट की इस फ़िल्म ने तेलुगु सिनेमा का इतिहास बदल दिया. रिलीज़ के कुछ समय बाद से ही उसे तेलुगु सिनेमा की इस दशक की सबसे बेहतरीन फ़िल्म माना जाने लगा. इसने फ़िल्म के लीड एक्टर विजय देवारकोंडा को रातों-रात एक स्टार और इसके डायरेक्टर संदीप रेड्डी वांगा को एक स्थापित डायरेक्टर बना दिया. ख़ुशी की बात यह है कि कबीर सिंह को भी संदीप रेड्डी वांगा ने ही डायरेक्ट किया है. किसी रीमेक का नाम सुन कर जहाँ पहले यही ख़याल आता है कि ज़रूर इस फ़िल्म का कबाड़ा हो गया, इस फ़िल्म के लिए उत्साह है कि एक ही डायरेक्टर द्वारा दो अलग-अलग भाषाओं में बनाई गई एक ही फ़िल्म कैसी होगी.

जिन्होंने अर्जुन रेड्डी देखी है उन्हें पता है कि सिनेमा जगत में इस तेवर वाला नायक अभी तक नहीं देखा गया है. हिंदी सिनेमा के लिए भी इस कलेवर का नायक नया ही है. बात अब ये आती है कि क्या शाहिद कपूर उस नायक के रूप में खुद को परिभाषित कर पाते हैं या नहीं और ऑडियंस उन्हें इस रोल में अपनाएगी या नहीं. मैं जानता हूँ कि जिन्होंने अर्जुन रेड्डी देख रखी है वो कबीर सिंह में भी अर्जुन रेड्डी की ही तलाश करेंगे. मतलब शाहिद कपूर में विजय देवारकोंडा का अक्स खोजने की कोशिश करेंगे. इसी वजह से यह फ़िल्म शाहिद के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण भी है. मेरी तो यही सलाह है कि अगर आपने अर्जुन रेड्डी नहीं देखी है तो कबीर सिंह देखने से पहले उसे मत देखिएगा. नहीं तो दिल-ओ-दिमाग से अर्जुन रेड्डी और विजय देवारकोंडा को उतार पाना मुश्किल हो जाएगा.